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मानवता सेवा संस्था
MANAVTA SEVA SANSTHA

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मानवता सेवा संस्था — Serving Humanity, Creating Hope

24 साल बाद मिला मां को उसका खोया हुआ बेटा

24 साल बाद माँ को मिला उसका बिछड़ा बेटा

एक सच्ची मानवता की कहानी जिसने हजारों लोगों को भावुक कर दिया

22 फरवरी 2025 की सुबह लगभग 8 बजे मुझे एक फोन आया। फोन करने वाले व्यक्ति ने कहा, “सर, एक पागल व्यक्ति है, जो ना कुछ बोलता है और ना ही लोगों से कुछ मांगता है। कोई देता है तो कुछ खा लेता है, नहीं तो ऐसे ही पड़ा रहता है।” मैंने बोला कि “कहाँ पर?” तो उसने बताया कि सोलापुर शहर के सात रास्ता पर है।

मैं तुरंत अपनी मोटरसाइकिल पर 35 लीटर पानी का कैन, बाल काटने की मशीन, नए कपड़े, तौलिया, साबुन और अन्य आवश्यक सामान रखा और तुरंत सात रास्ता की ओर निकल पड़ा।

जब मैं वहाँ पहुँचा तो देखा कि सड़क किनारे बैठा वह व्यक्ति पूरी तरह गंदगी से ढका हुआ था। उसके बाल इतने बड़े और उलझे हुए थे कि चेहरा भी ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था। शरीर पर महीनों की जमी हुई धूल और मिट्टी थी। कपड़े इतने गंदे थे कि उनके पास खड़ा होना भी मुश्किल था। राह चलते लोग उसे देखकर निकल रहे थे, लेकिन कोई उसके पास जाने की हिम्मत नहीं कर रहा था।

मैं उसके पास जाकर बैठ गया। प्यार से उसका हाल पूछा, लेकिन वह कुछ भी बताने को तैयार नहीं था। उसकी आँखों में डर था, विश्वास नहीं। मैंने सोचा, पहले इसे इंसान होने का एहसास दिलाना जरूरी है।

मैंने वहीं सड़क किनारे उसके बाल काटने शुरू किए। धीरे-धीरे उसके बड़े-बड़े उलझे बाल हटने लगे। कटिंग पूरी होने के बाद मैंने उसके पुराने कपड़े उतारकर उसे कई बार साबुन से नहलाया। उसके सिर और शरीर पर इतनी मिट्टी जमी हुई थी कि एक बार साबुन लगाने से साफ ही नहीं हो रही थी। कई बार पानी डाला, कई बार साबुन लगाया। जब मैं उसकी पीठ साफ कर रहा था, तभी मेरी नजर उसकी पीठ पर बने एक जन्म के निशान (मुंश) पर पड़ी। उस समय मुझे नहीं पता था कि यही निशान आगे चलकर उसके परिवार तक पहुँचने की सबसे बड़ी पहचान बनेगा।

नहलाने के बाद मैंने उसे नए कपड़े पहनाए। फिर उसे नाश्ता कराया और गरम चाय पिलाई। उसके चेहरे पर पहली बार हल्की मुस्कान दिखाई दी। मैंने फिर प्यार से पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”

उसने धीरे से कहा, “धर्मेंद्र…”

मैंने पूछा, “कहाँ के रहने वाले हो?”

उसने सिर्फ इतना कहा, “झारखंड…”

बस, इसके आगे वह कुछ नहीं बोल पाया।

मैंने बहुत कोशिश की कि वह अपने गाँव, जिला, परिवार या किसी रिश्तेदार का नाम बताए, लेकिन वह बार-बार चुप हो जाता। उस दिन मुझे समझ आ गया कि यह काम एक दिन में पूरा होने वाला नहीं है।

अगले दिन मैं फिर उसके पास पहुँचा। उसके लिए चाय और नाश्ता लेकर गया। इस बार मैं उसके साथ जमीन पर बैठ गया। मैंने उससे कोई पूछताछ नहीं की, बल्कि एक दोस्त की तरह बातें करने लगा। धीरे-धीरे उसका डर कम होने लगा। काफी देर बाद उसने सिर्फ एक शब्द कहा—

“बोकारो…”

यही मेरे लिए पहली उम्मीद की किरण थी।

उस दिन रात को मैं कई घंटे तक मोबाइल पर बैठा रहा। गूगल मैप पर बोकारो जिले की जानकारी खोजता रहा। अगले दिन फिर उसके पास गया। उसे खाना खिलाया और प्यार से पूछा, “बोकारो में कहाँ?”

उसने इस बार कहा—

“नारायणपुर…”

अब मेरे पास दो शब्द थे—बोकारो और नारायणपुर।

मैंने उसी समय मोबाइल पर खोजा तो पता चला कि बोकारो जिले में नारायणपुर नाम के तीन गाँव हैं। लेकिन कौन-सा सही है, यह समझना मुश्किल था।

मैं हर दिन सुबह और शाम उसके पास जाता। कभी चाय, कभी नाश्ता, कभी खाना लेकर जाता। उसके साथ बैठकर बातें करता। उसका विश्वास जीतना ही मेरी सबसे बड़ी कोशिश थी।

पाँचवें दिन उसने एक और शब्द कहा—

“पोखर…”

पहले मुझे लगा कि वह किसी तालाब की बात कर रहा है, लेकिन जब मैंने दोबारा पूछा तो उसने बार-बार यही शब्द दोहराया। अब मुझे लगा कि शायद यह किसी गाँव का नाम है।

उस रात मैंने फिर गूगल मैप पर खोज शुरू की। जहाँ भी कोई नंबर मिलता, मैं फोन करता। बोकारो जिले के सरपंच, पंचायत, गाँव के लोग, सरकारी कार्यालय—जिसका भी संपर्क मिला, मैंने बात की। लगभग 100 से अधिक लोगों से संपर्क किया, लेकिन कोई भी सही जानकारी नहीं दे पाया।

कई लोगों ने कहा, “हमें नहीं पता।”

कई लोगों ने फोन ही नहीं उठाया।

लेकिन मैंने हार नहीं मानी।

आखिरकार मैंने झारखंड पुलिस मुख्यालय से संपर्क किया। वहाँ से मुझे नारायणपुर थाने का नंबर मिला। मैंने नारायणपुर थाने में फोन किया तो एक सब-इंस्पेक्टर श्री अनिल लिंडे जी ने फोन उठाया। मैंने उनको पूरी कहानी सुनाई और धर्मेंद्र की फोटो भेजी।

उन्होंने अगले दिन फोन करके बताया कि उनके रिकॉर्ड में पिछले कई वर्षों से इस व्यक्ति की कोई गुमशुदगी दर्ज नहीं है।

मैंने उनसे हाथ जोड़कर सिर्फ एक बात कही—

“सर, मैं आपसे विनती करता हूँ। एक बार गाँव जाकर लोगों को इसकी फोटो दिखा दीजिए। हो सकता है कोई इसे पहचान ले।”

मेरी बात सुनकर वह अधिकारी स्वयं गाँव पहुँचे। उन्होंने गाँव वालों को फोटो दिखाई, लेकिन सभी ने कहा कि वे इस व्यक्ति को नहीं पहचानते।

जब वह वापस लौट रहे थे, तब रास्ते में एक बुजुर्ग व्यक्ति मिले। उन्होंने भी वही फोटो दिखाई।

बुजुर्ग कुछ देर तक फोटो देखते रहे और फिर बोले—

“लगभग 24 साल पहले हमारे गाँव का एक लड़का गुजरात कमाने गया था। उसके बाद कभी वापस नहीं आया।”

तो पुलिस वाले ने उसके घर का पता पूछा और उसके घर पहुँचे। वहाँ पर उसकी माँ, चाचा, चाची, भाई और भाई की पत्नी मिले। पहले तो परिवार पुलिस को देखकर डर गए। फिर उनसे बोला कि “डरो मत, हम आपको कुछ जानकारी देने के लिए आए हैं।”

उनसे पूछा कि “आपका कोई लड़का खोया था?”

तो उसकी माँ रोने लग गईं और बोलीं—

“साहब, आज से 24 साल पहले, जब वह महज 14 वर्ष की उम्र में गाँव के कुछ लोगों के साथ गुजरात काम करने गया था। उसी समय गुजरात के कच्छ (भुज) क्षेत्र में 26 जनवरी 2001 को बहुत विनाशकारी भूकंप आया था। उसके बाद वह कभी वापस नहीं लौटा। हमारे गाँव के सभी लोग वापस आ गए थे, लेकिन हमारा लड़का नहीं आया था।”

“हमने पूछा तो बोला कि उस दिन 26 जनवरी थी, तो वह नजदीकी स्कूल में प्रोग्राम देखने चला गया था और भूकंप के कारण उस स्कूल के बहुत से बच्चे बिल्डिंग में दबकर मर गए थे। हमने उसको दो दिन तक ढूँढा था, लेकिन वह नहीं मिला, तो हम सब गाँव आ गए।”

फिर उसकी माँ बोलीं कि “हमने उसका कई सालों तक इंतजार किया। इस बीच उसके पिता जी अपने बेटे के खोने की टेंशन में दो साल बाद चल बसे। तो हमारे घर में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।”

उस समय वहाँ जो भी लोग मौजूद थे, सबकी आँखों में आँसू झलक रहे थे।

फिर पुलिस वाले ने दर्द भरी आवाज में बोला, “क्या आप अपने बेटे को पहचानते हो?”

उसकी माँ बोलीं, “साहब, 24 साल हो चुके हैं हमारे बेटे को मरे हुए। अब कैसे पहचान पाएँगे उसे? लेकिन मैं माँ हूँ। अपने बेटे को 1000 लोगों के बीच में भी पहचान लेती, अगर वह जिंदा होता तो।”

फिर पुलिस वाले ने बोला, “मेरे पास एक फोटो है। क्या आप इसको पहचान सकते हो?”

जैसे ही माँ ने फोटो को बड़े गौर से देखा, उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। फिर एक-एक करके सभी लोगों ने फोटो को देखा। कुछ लोगों ने बोला, “ये हमारा लड़का नहीं है।” किसी ने कहा कि “थोड़ी-थोड़ी शक्ल तो मिलती है।”

लेकिन उसकी माँ के मुँह से कोई शब्द नहीं निकल रहे थे, बस रोए जा रही थीं।

बड़ी मुश्किल से उसकी माँ को शांत किया और पूछा कि “क्या आपके बेटे के शरीर पर कोई निशान है, जिसको देखकर आप पहचान सकते हो?”

बाकी परिवार वाले तो बोले कि कोई निशान नहीं था, लेकिन आखिर माँ तो माँ होती है। उसको पता था कि मेरे बेटे की पीठ पर (मुंश) तिल का निशान है।

मुझे सब-इंस्पेक्टर साहब ने फोन किया और बोला, “मीणा जी, आप अभी कहाँ पर हो?”

मैंने बोला कि “मैं उस लड़के के लिए खाना लेकर जा रहा हूँ और उससे उसके परिवार वालों के बारे में कुछ जानकारी पूछने की कोशिश करता हूँ।”

तभी पुलिस वाले ने बड़े कॉन्फिडेंस के साथ बोला कि “अब आपको कुछ पूछने की जरूरत नहीं है।”

जैसे ही पुलिस वाले ने ऐसा बोला तो पता नहीं क्यों मेरी आँखों में आँसू आ गए।

फिर पुलिस वाला बोला कि “मैं उस लड़के के घर पर पहुँच गया हूँ और उसकी माँ बोल रही हैं कि हमारा बेटा होगा तो उसके पीठ पर मुंश का निशान होगा।”

जैसे उसने ये शब्द बोला तो मैं इतना खुश हुआ था जैसे कि मुझे करोड़ों रुपए की लॉटरी लग गई हो, क्योंकि मुझे पता था कि उसकी पीठ पर मुंश का निशान है। क्योंकि मैंने उसको दो बार नहलाया था और उसकी पीठ पर भी साबुन लगाया था, तो मैंने उसकी पीठ पर मुंश का निशान देखा था।

मैंने पुलिस वाले को बोला, “सर, उसकी पीठ पर मुंश का निशान है। मैंने देखा है।”

तो पुलिस वाला भी बहुत खुश हो गया था और बोला कि “शायद अपनी मेहनत सफल हो गई। आप जल्दी उस लड़के के पास जाओ और वीडियो कॉल उस लड़के की फोटो दिखाएँ, ताकि उसके घर वाले उसको पहचान सकें।”

मैं तुरंत उस लड़के के पास पहुँचा और वीडियो कॉल किया। जैसे ही उसकी माँ ने अपने बेटे को देखा, वह जोर-जोर से रोने लगी।

इधर धर्मेंद्र भी अपनी माँ को देखकर रोने लगा।

24 साल बाद माँ और बेटे की पहली मुलाकात मोबाइल की स्क्रीन पर हो रही थी।

उस समय मेरी आँखों से भी आँसू निकल पड़े।

शायद जिंदगी में पहली बार मैंने महसूस किया कि किसी इंसान को उसके परिवार से मिलाने की खुशी कितनी बड़ी होती है। परिवार के सभी लोगों ने धर्मेंद्र से बात की और धीरे-धीरे यह बात आग की तरह उसके पूरे गाँव में फैल गई, और मात्र 1 घंटे में 100 से ज्यादा लोगों की भीड़ जमा हो गई।

फिर उसके घर वालों ने बोला कि “इसको किधर भी जाने मत देना, हम इसके छोटे भाई को लेने के लिए भेज रहे हैं।”

फिर दो दिन बाद धर्मेंद्र का छोटा भाई सोलापुर पहुँचा।

28 फरवरी 2025 को हमने धर्मेंद्र को फिर से नहलाया, नए कपड़े पहनाए और फूलों की माला पहनाकर सम्मानपूर्वक विदाई दी। रेलवे स्टेशन जाकर उसका टिकट कराया। रास्ते के लिए कुछ आवश्यक सामान और आर्थिक सहायता भी दी।

मैंने उसके भाई से सिर्फ एक बात कही—

“गाँव पहुँचकर इसे सीधे मत बताना कि यही तुम्हारा घर है। इसे धीरे-धीरे गाँव में लेकर जाना। देखना, क्या यह अपनी माँ और घर को पहचानता है।”

उन्होंने बिल्कुल वैसा ही किया।

जैसे ही धर्मेंद्र गाँव पहुँचा, पूरे गाँव में खबर फैल गई।

लोग अपने घरों से बाहर निकल आए।

जब धर्मेंद्र ने अपनी माँ को देखा और माँ ने अपने बेटे को गले लगाया, तब पूरा गाँव रो पड़ा।

24 वर्षों का इंतजार उस एक पल में खत्म हो गया।

उसका छोटा भाई अब बड़ा हो चुका था। उसकी शादी हो चुकी थी। उसके बच्चे भी थे। गाँव के कई लोग तो धर्मेंद्र को जानते भी नहीं थे, क्योंकि वह उनके जन्म से पहले ही घर छोड़ चुका था।

कुछ दिन बाद परिवार ने मुझे वीडियो कॉल किया। उनकी आँखों में खुशी के आँसू थे।

उन्होंने कहा—

“हमें लगा था हमारा बेटा अब कभी वापस नहीं आएगा। आपने हमारा परिवार फिर से पूरा कर दिया।”

उस दिन मुझे लगा कि मैं कुछ नहीं हूँ। मैं तो सिर्फ एक माध्यम था। करने वाला तो कोई और है।

अगर उस दिन वह फोन नहीं आता, अगर मैंने उस दिन वहाँ जाने में देर कर दी होती, अगर मैंने हार मान ली होती, अगर झारखंड पुलिस के उस ईमानदार सब-इंस्पेक्टर ने सहयोग न किया होता, तो शायद धर्मेंद्र आज भी किसी सड़क पर भटक रहा होता और उसकी माँ अपने बेटे का इंतजार करते-करते इस दुनिया से चली जाती।

आज भी जब मैं इस घटना को याद करता हूँ, मेरी आँखें नम हो जाती हैं।

यह कहानी सिर्फ धर्मेंद्र की नहीं है।

यह उन हजारों लोगों की कहानी है जो मानसिक बीमारी, गरीबी, दुर्घटना या किसी मजबूरी के कारण अपने परिवार से बिछड़ जाते हैं।

अगर आपके आसपास भी कभी कोई ऐसा व्यक्ति मिले, तो उससे डरिए मत। उससे प्यार से बात कीजिए। अगर भूखा हो तो खाना खिलाइए। अगर वह कुछ याद कर पा रहा हो, तो उसकी बात ध्यान से सुनिए। हो सकता है, आपकी एक छोटी-सी कोशिश किसी माँ को उसका खोया हुआ बेटा वापस दिला दे।

मानवता सेवा संस्था का विश्वास है कि “मानवता की सेवा करना ही सबसे बड़ा धर्म है।”

यह कहानी उसी विश्वास की एक सच्ची मिसाल है।

 

1 thought on “24 साल बाद मिला मां को उसका खोया हुआ बेटा”

  1. “मानवता सेवा संस्था टीम” बहुत ही अच्छा काम कर रही है, आप समाज को अच्छा मैसेज दे रहे हो , मानवता सेवा संस्था को सपोर्ट करने वाले सभी भाइयों को दिल से सैल्यूट !

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