






एक छोटी-सी मदद… और उजड़ा हुआ परिवार फिर से बस गया
आज भी जब मैं इस घटना को याद करता हूँ, तो मेरे मन में एक अजीब-सी भावुकता पैदा हो जाती है। कई बार सोचता हूँ कि अगर उस दिन हम उस महिला के पास नहीं गए होते, तो न जाने आज वह कहाँ होती और उसका परिवार उसे दोबारा देख भी पाता या नहीं।
यह बात 02 मार्च 2024 की है।
शाम करीब 6:30 बजे मैं ड्यूटी से घर आया था। तभी मेरे बच्चों ने मुझसे कहा—
“पापा, जिधर हम कचरा डालते हैं, उधर एक मौसी पड़ी हुई हैं, हम श्याम 4 बजे स्कूल से आ रहे थे, तब उस ने पानी मंगा था, तो हम एक बोतल पानी देकर आए, और शायद वह भूखी भी है,
मैंने सोचा कि अभी खाना बन रहा है। खाना बन जाए तो उनके लिए भी खाना लेकर चलेंगे और उन्हें खाना खिला आएंगे।
करीब 8:30 बजे मैं अपनी बेटी तनु मीणा के साथ उनके पास पहुँचा।
वहाँ का दृश्य देखकर हम दोनों कुछ पल के लिए बिल्कुल चुप हो गए।
चारों तरफ अंधेरा था और वह महिला एक ऐसी प्लास्टिक की कवर के अंदर सो रही थी, जिसे लोग आमतौर पर अपनी गाड़ी को ढकने के लिए इस्तेमाल करते हैं। हमने उन्हें आवाज देकर उठाया और जैसे ही वह प्लास्टिक हटाया, उनकी हालत देखकर हमारा दिल भर आया।
वह महिला पसीने से पूरी तरह भीग चुकी थी। गर्मी और घुटन के कारण उनकी हालत बहुत खराब थी।
हमने पहले उनके चेहरे का पसीना साफ किया, उन्हें पानी पिलाया। ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें बहुत देर से पानी तक नसीब नहीं हुआ हो।
हमने उनसे बात करने की कोशिश की, लेकिन वह हमारी भाषा नहीं समझ पा रही थीं। उनकी बोली दक्षिण भारत की किसी भाषा जैसी लग रही थी।
तभी हमारी नजर उनके पैरों और हाथों पर गई। चोट के निशान थे।
हम उनके लिए खाना लेकर गए थे। लेकिन वह अपने हाथों से ठीक से खाना नहीं खा पा रही थीं।
उस समय मैंने बिना कुछ सोचे अपने हाथों से उन्हें खाना खिलाया।
उस पल मेरे मन में सिर्फ एक ही बात थी—
“यह भी किसी की माँ है… किसी की पत्नी है… किसी के बच्चों की माँ है। आखिर इसे भी तो किसी अपने का इंतजार होगा।”
खाना खिलाने के बाद हमने उनके पैर की चोट पर प्राथमिक उपचार किया।
रात काफी हो चुकी थी, इसलिए उन्हें कहीं ले जाना भी संभव नहीं था। हमने पास में एक मकान के किनारे थोड़ी सुरक्षित जगह देखकर उन्हें रात वहीं आराम करने के लिए कहा।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी।
अगली सुबह जब हम उनके पास पहुँचे तो उनके कपड़े बहुत ज्यादा गंदे हो चुके थे।
मेरे मन में एक विचार आया कि अगर इन्हें इसी हालत में अस्पताल लेकर गए तो शायद लोग इन्हें गंभीरता से न लें। इसलिए मैं बाजार गया और उनके लिए एक नया मैक्सी लेकर आया।
हमने उन्हें वह कपड़ा पहनाया और फिर एक ऑटो से उन्हें अस्पताल लेकर गए।
अस्पताल में मेरे दोस्त मंगेश वाटवटेकर थे। मैंने उन्हें पूरी बात बताई। उन्होंने कहा—
“आप इन्हें लेकर आ जाइए, हम इनका इलाज करवाएंगे और इन्हें एडमिट करवा देंगे।”
महिला को अस्पताल में भर्ती कराया गया।
अस्पताल में एक कंपाउंडर आंध्र प्रदेश का रहने वाला था। हमने उससे अनुरोध किया कि वह उस महिला से उसकी भाषा में बात करने की कोशिश करे।
उसने महिला से उनकी भाषा में बातचीत की।
धीरे-धीरे महिला को कुछ बातें याद आने लगीं।
न उनके पास कोई मोबाइल था, न कोई संपर्क नंबर और न ही वह अपना पूरा पता बता पा रही थीं।
लेकिन हमने उम्मीद नहीं छोड़ी।
हमने कंपाउंडर से भी कहा कि वह रोज थोड़ी-थोड़ी बातचीत करके उनके गांव और परिवार के बारे में जानने की कोशिश करे।
हम भी रोज अस्पताल जाकर उनसे मिलते रहे।
आखिरकार कई कोशिशों के बाद उस महिला ने आंध्र प्रदेश के कडप्पा रेलवे स्टेशन के पास स्थित अपने गांव के बारे में कुछ जानकारी दी।
अब हमारे सामने एक और चुनौती थी—उस गांव तक पहुँचना।
हमने कडप्पा रेलवे स्टेशन का संपर्क नंबर निकाला और वहां के स्टेशन मास्टर से बात की।
स्टेशन मास्टर ने हमारी बात बहुत ध्यान से सुनी और हमारी मदद करने के लिए तैयार हो गए।
हमने उन्हें गांव का नाम बताया।
उन्होंने कहा—
“इस गांव का एक लड़का हमारे स्टेशन पर काम करता है। हम उससे बात करते हैं।”
कुछ ही समय बाद उस कर्मचारी से हमारी बात हुई। हमने उसे उस महिला की तस्वीर भेजी।
फोटो देखते ही उसने कहा—
“हाँ, मैं इन्हें पहचानता हूँ। यह हमारे गांव की महिला हैं। ये पिछले लगभग एक साल से लापता हैं।”
यह सुनते ही हमारी आँखों में खुशी आ गई।
हमें पता चला कि उनके परिवार वाले उन्हें लगभग एक साल से ढूंढ रहे थे। उनके बच्चे अपनी माँ के वापस आने का इंतजार कर रहे थे।
महिला की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी और इसी वजह से वह घर से निकल गई थीं।
उस पल हमें महसूस हुआ कि शायद भगवान ने हमें उस रात सिर्फ इसलिए उनके पास भेजा था, ताकि हम उन्हें उनके परिवार तक वापस पहुँचा सकें।
अस्पताल में करीब 7 दिन इलाज के बाद जब उनकी हालत बेहतर हुई तो हमने उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज कराया।
हमने उनके लिए आंध्र प्रदेश जाने वाली ट्रेन में रिजर्वेशन कराया।
उन्हें ट्रेन में सीट पर बैठाया और उनकी बगल वाली सीट पर बैठे यात्री से हाथ जोड़कर कहा—
“भाई साहब, यह महिला अकेली हैं। कृपया इन्हें रास्ते में कहीं उतरने मत देना। कडप्पा स्टेशन पर इनके परिवार के लोग इन्हें लेने आएंगे। कृपया आप इन्हें वहां तक पहुंचाने में हमारी मदद कर दीजिए।”
उस यात्री ने भी इंसानियत दिखाई और हमारी बात मान ली।
हमने कडप्पा स्टेशन मास्टर को भी पहले ही फोन करके ट्रेन, कोच और सीट नंबर की पूरी जानकारी दे दी।
उन्होंने महिला के परिवार वालों को स्टेशन पर बुला लिया।
और फिर वह पल आया, जिसका हमें कई दिनों से इंतजार था।
जैसे ही ट्रेन स्टेशन पर पहुँची, परिवार वाले उन्हें लेने के लिए दौड़ पड़े।
एक साल से जिस माँ का इंतजार उनके बच्चे कर रहे थे, वह माँ आखिरकार उनके सामने थी।
परिवार की आँखों में खुशी थी।
एक माँ अपने बच्चों के पास लौट आई थी।
एक परिवार, जो लगभग एक साल से अधूरा था, फिर से पूरा हो गया था।
हमने उनके परिवार से सिर्फ इतना कहा—
“जब यह अपनी माँ के साथ घर पहुँच जाएँ, तो हमें एक बार वीडियो कॉल जरूर करना… ताकि हमें भी पता चले कि हमारी छोटी-सी कोशिश सफल हुई।”
कुछ समय बाद हमारे पास वीडियो कॉल आया।
स्क्रीन पर वह महिला अपने बच्चों के साथ बैठी थीं।
उनके चेहरे पर खुशी थी।
उनके बच्चों के चेहरे पर अपनी माँ को वापस पाने की खुशी थी।
और सच कहूँ तो उस पल हमारी आँखें भी नम हो गईं।
आज भी वह महिला कभी-कभी हमें फोन करती हैं और वीडियो कॉल करती हैं।
भाषा की समस्या के कारण हम उनसे ज्यादा बातचीत नहीं कर पाते। वह बहुत कुछ कहना चाहती हैं और हम भी उनसे बहुत कुछ पूछना चाहते हैं, लेकिन उनकी भाषा हम समझ नहीं पाते।
फिर भी उनके चेहरे की मुस्कान देखकर हमें एक ही बात समझ आती है—
वह अपने घर में हैं। अपने बच्चों के साथ हैं। और यही हमारे लिए सबसे बड़ी खुशी है।
आज जब मैं इस घटना को याद करता हूँ तो मन में एक सवाल जरूर आता है—
अगर उस रात हम उन्हें अनदेखा करके चले जाते तो क्या होता?
शायद हमें कभी पता भी नहीं चलता कि वह महिला कौन थी।
शायद उनका परिवार उन्हें कभी ढूंढ नहीं पाता।
और शायद वह महिला कभी अपने बच्चों के पास वापस नहीं पहुँच पाती।
इसलिए मैं आप सभी से हाथ जोड़कर एक छोटी-सी अपील करना चाहता हूँ—
अगर आपके आसपास कोई बुजुर्ग, महिला, बच्चा या कोई ऐसा व्यक्ति दिखाई दे जो भटक गया हो, बेसहारा हो या जिसकी हालत खराब हो, तो उसे देखकर सिर्फ आगे मत बढ़ जाइए।
थोड़ा रुकिए।
उससे बात करने की कोशिश कीजिए।
उसे पानी पिलाइए।
जरूरत हो तो खाना खिलाइए।
और उसकी स्थिति के अनुसार उचित सहायता करने की कोशिश कीजिए।
हो सकता है आपकी छोटी-सी कोशिश किसी की जिंदगी बदल दे।
हो सकता है आपके कुछ मिनट किसी माँ को उसके बच्चों से मिला दें।
हो सकता है आपकी छोटी-सी मदद किसी उजड़े हुए परिवार को फिर से बसा दे।
क्योंकि…
“हम किसी की पूरी जिंदगी नहीं बदल सकते, लेकिन किसी के जीवन का एक मुश्किल पल जरूर आसान कर सकते हैं।”
और शायद यही मानवता की सबसे बड़ी सेवा है।
मानवता सेवा संस्था टीम